मंगलवार, 24 जून 2014

गीत- मै जाग नही पाऊं मै सो नही पाऊं

मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
ये नागिन सी ज़ुल्फ़ें, जब दिल पे लहरायें
और शबनम सी ऑंखें, मदहोशी बरसायें
तो मै तेरे दिलकश, सपनो में खो जाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
जब साँझ लगे ढलने, तो तेरी याद सताए
फिर रात भर आँखों में, नींद कैसे आये
तब प्यार बनके तेरे, ख़्वाबों में रंग जाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
फ़लक पे चमकते सितारे, तेरी याद दिलाएं
रात में ठंडी हवा के झोंके, मेरा चैन चुराएं
बदलता रहूँ करबटें, फिर सो कैसे पाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं

                                -नागेन्द्र दत्त शर्मा

जीवन धारा


चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
चंचल लहरों सा टकरा रहा है, नहीं कोई सहारा
फसी हुई है बीच भंवर में अपनी जीवन नौका
डोल रही है बिन मांझी के, ढूंढ़ रही कोई मौका
साँझ-सवेरे निकल चुके,नज़र न आया सहारा
चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
न मिला कोई जीवन सागर में पार लगाने वाला
न दिखा साथी कोई यहाँ दुःख-सुख बाँटने वाला
जितने भी इस जग में देखे जालिम हैं वो यारां
चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
                                         -नागेन्द्र दत्त शर्मा




आपके मस्तिष्क के चमत्कार !



आज़   के युग मे  मनुष्य की जिंदगी इतनी व्यस्त होगयी है कि उसे अपने आस-पास सिर्फ़ अपने अतिरिक्त और कोई नहीं दिखाई नहीं देता। आज जबकि  मनुष्य ने इतनी ज्यादा उन्नति करली है कि उसके विचार भी वर्तमान युग की प्रगति  के हिसाब से तथा उसके शिक्षित होने के हिसाब से और अधिक उत्तम होने चाहियें थे, परन्तु ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

जीवन हमारे विचारों और क्रियाओं से संचालित होता है न कि भौतिक तत्वों की निर्भरता पर। यदि हमारे विचार और क्रियाएं दोषपूर्ण हैं तो  मन और शरीर दोनों रुग्ण हो जाते हैं तथा  जब तक उनमे निर्मलता नहीं आजाती  औषधि भी कोई कार्य नहीं करती है। इसलिए सकारात्मक विचारधारा के अवलम्बन पर ही हमारा अवचेतन मन हमारे जीवन को उन्नति के पथ पर अग्रसर करता है।

इस पुस्तक में दी गयी सोच-विचार की तकनीको , विधियों एवं दुनियादारी निभाने की तरकीबों पर  जितने अच्छे ढंग से आप अमल करेंगे उतनी ही जल्दी सफलता की मंजिल तय कर पायेंगे। संक्षेप में अगर सार की बात कहें तो यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच का मामला है की वह किस तरह वह अपनी जिंदगी जीता है।

 मानव मस्तिष्क के अन्तर्गत उसका अवचेतन मस्तिष्क एक कभी न खत्म होने वाली कहानी की ही तरह हमेशा बिना थके, बिना रुके कार्य करता रहता है। आप अच्छे विचार अपनायेंगे  तो आपका जीवन ख़ुशहाल बनेगा, बुरे विचार अपनायेंगे तो आपका जीवन दुःखदायी  हो जायेगा क्योंकि यह आपकी  अपनी सोच का ही अविश्वसनीय परिणाम है।


बहुत से लोगों ने यह परखा अथवा अनुभव भी किया होगा की जैसे ही आप अपनी सोच बदलते हैं, आपकी जीवनधारा भी नया मोड़  लेलेती  है और उसके पश्चात आप प्रगति के नए रास्तों पर चलने लगते हैं और उन्नति के नये -नये शिखर छूने लगते हैं।  सकारात्मक सोच के  मालिक हैं उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से और भी ज्यादा सफलता प्राप्त  वाली है।  

आइये अब आपको सफलता की  मंज़िल की  ओर ले चलते हैं। 





मंगलवार, 17 जून 2014

सिक्के के दो पहलू

कहते हैं लोग इस जहां में
इक 'हाँ' है तो इक 'ना' भी है
इक फूल है तो इक कांटा भी है
जहाँ अमृत है वहां विष भी है
अगर दिन है तो रात भी है
अँधेरा है तो उजाला भी है
उदय है तो अवसान भी है
जहाँ धूप है वहां छाँव भी है
सुबह है तो फिर साँझ भी है
जीवन भी है तो मरण भी है
भलाई है तो बुराई भी है
वक्रता है तो सीधाई भी है
आग है तो पानी भी है
हर एक कहानी में भैया
राजा है तो रानी भी है
चोर है तो सिपाही भी है
प्रत्येक यात्रा वृतान्त में 
मंजिल है तो राही भी है
इस जग में सदा विद्यमान
रहेंगे ही शास्वत दो प्रतिमान
हर चेहरे पे जैसे नाक और कान
सोचें तो मानव की बस ये ही शान
देखे होंगे आपने भी अद्भुत रंग
कर देते हैं जो कभी सभी को दंग
महसूसे होंगे कुछ दुःख के पल
खुशियों और कुछ सुख के पल
रंग-बिरंगे हसीन सतरंगे पल
बीत गया जो इक वो भी कल 
और आने वाला इक वो भी कल
आज ही नहीं जब शेष हुआ
अभी तक जो आया ही नहीं 
वो कैसे फिर विशेष हुआ
मन में वो आशाओं का दीप
जब तक भी प्रदीप्त रहे
तब तक उत्कट अभिलाषा
जीवन की अतृप्त पिपासा
जीने के लिए ही दीप्त रहे
वर्ना बुझ गयी अगर वो प्यास
हो जायेगा सब कुछ समाप्त
जिसका आशय है हमसे
हमारी जीवंतता समाप्त
हमारा उद्द्येश्य समाप्त
हमारा लक्ष्य समाप्त
सारी आकांक्षायें समाप्त
जड़वत पाषाण सदृश
पाषाण जो एक दम स्थिर  
न कोई भाव, न भंगिमा
न विचार, न संवेदना के स्वर
जीवन है तो सब कुछ
नहीं तो सब कुछ निरर्थक
सिक्के के दोनों पहलू 
जो यहाँ पूर्ण सार्थक
एक अकथनीय कहानी
अपने-अपने अर्थों में पूर्ण सार्थक
अपने-अपने पक्षों पर पूर्ण भारी
बिलकुल रस्सा-कस्सी जैसा दृश्य 
कभी कोई इस पार
कभी कोई उस पार
दोनों के अपने-अपने मूल्य 
दोनों की अपनी -अपनी पहचान
समवेत स्वरों का गुंजन
प्रतिस्पर्धात्मक नज़ारा
जाज्वल्यमान चेहरे
इक-दूजे की आस्था के स्तम्भ
तर्क-संगत निर्णयक क्षमता 
वाह ! तू धन्य है प्रकृति
तेरा खेल ही है न्यारा
संघर्षपूर्ण वातावरण का सृजन
लयबद्ध ताल-छंद और गति
धन्य प्रभु ! तेरी ऐसी समृद्धि
                 -नागेन्द्र दत्त शर्मा






मंगलवार, 10 जून 2014

ग़ज़ल - मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग...

मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग
नित करते गलत धन का भोग
बाहर से दिखती मौज ही मौज
पर भीतर से खाते रोग ही रोग
कभी नहीं की मदद किसी की
पर धन का तो करते रहते योग
न्याय किसी से भी किया नहीं
अपनी बारी में अब कैसा ढोंग
नहीं झांकते गिरेबां में अपने
क्यों जलते देख औरों का जोग
चंद दिनों की ही तो जिंदगी है
करलो थोड़ा इसका सदुपयोग
धर्म-कर्म तो भुला ही दिया है
जाने क्यों बिक जाते हैं लोग
तुमने क्या सोचा है 'नागेन्द्र'
किस इलाज़ से भागेगा रोग
            -नागेन्द्र दत्त शर्मा 

एक दिन सवेरे घर से निकल कर..

एक दिन सवेरे घर से निकल कर 
चला जा रहा था मैं कदम बढाकर 
बेसुध होकर कल्पनाओं में खोकर 
बढ़ा जा रहा था कंटीली डगर पर 
सपनो की कागजी नाव बनाकर 
विचारों के सागर में डूब-उतराकर 
पतवार बिना नाविक को बिठाकर 
शंकाओं के भंवर में खुद को डुबोकर 
नजरें कहीं शून्य में स्थिर जमाकर 
बिना लक्ष्य के जैसे तीर चलाकर 
स्वयं को मोह-माया में फंसा कर 
जिंदगी को पूर्ण निरर्थक बनाकर 
जीवन की उबड़-खाबड़ डगर पर 
कैसे सुनाऊं ये अफ़साना बनाकर 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 










रविवार, 8 जून 2014

ग़ज़ल- मैंने जितने भी साल बिताये यहाँ .....

जितने भी साल मैंने बिताये यहाँ
जीवन के अनमोल पल सजाये यहाँ 
एक नयी डगर पर जब पड़े कदम 
लेकर वही मुझको चले आये यहाँ 
कितने मेले लगे इस जिंदगी में 
कितने सबक सीखे-सिखाये यहाँ  
हर कोई आया जिंदगी के सपने सजाने 
सपना भी सभी का न पूरा हो पाये यहाँ  
जितनी यादें संजोकर रखी दिल मे 
कैसे कोई उनको मिटा पाये यहाँ 
न जाने कैसे किससे कब रिश्ता बना 
आज तक भी कोई न समझ पाये यहाँ 
तरह-तरह के लोग मिले इस जगह 
होली के रंग हो जैसे बिखराये यहाँ 
एक अंजानी सी चाहत दिल में लिए 
न चाहते हुए सभी रुखसत पाये यहाँ 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 

शनिवार, 7 जून 2014

हवाई-महल


क्यों खो देते हो तुम वज़ूद अपना

जमीनी हकीकत को भुलाकर
निगाहें तो रहती हैं हरदम फ़लक पे
मगर पैर जमीं पर टिकते नहीं
चाहत तो है चाँद को पाने की मगर
क़ाबलियत छत पर जाने की भी नहीं
क्या ये सच नहीं ? अगर सच है तो-
समझो तो पहले अपने आप को
सोचो आगा-पीछा अपना, सम्भालो होश
देखो किधर है कुवां - किधर खाई ?
फिर भरो दम अपने में इत्मीनान से
कुछ पाने के लिए रखो हौसला
हो ठीक से पता मंज़िल का
हो इरादा भी नेक और पक्का तो
मिल जाती है फतह अपने आप ही
क्योंकि राह दिखाने वाला जानता है  
कि कौन कितने पानी में है ?
किसकी नीयत कैसी है, इरादा क्या है ?
किसे कहाँ पहुँचाना है ?
क्योंकि तुम क्या 'नागेन्द्र' सभी तो
उसके हाथों की कठपुतलियां ही हैं
जिनकी सारी डोरियाँ उसके ही हाथों में हैं
कोई नहीं जानता वह कब कौन से
हाथ की, पैर की या गर्दन की डोर या
सारी डोरियाँ एक साथ खीँच ले
जब तक की उसका जी नहीं भरता
तभी तक तुम अपने पर गरूर कर सकते हो
वरना तुम्हारी औकात ही क्या है ?
जोड़ो हक़ीक़त से वास्ता अपना
बंद करो देखना रोज नया सब्ज़बाग
तलाशो अपनी सही मंजिल
क्योंकि जो दिखाई देता है
वह हमेशा सच नहीं होता
"हवाई-महल" बनाकर कभी
जीवन सफल नहीं होता
हमेशा सपनो की दुनिया में रहकर
कोई भी सपना सच नहीं होता
तुम बनाओ अपना लक्ष्य कर्म को
छोडो फल की इच्छा, समझो मर्म को
कर्म करके ही जीत मिलती है
मेहनत से ही ज़िंदगी संवरती है
भाग्य के सहारे पेट नहीं पलता है
दुनिया में मुफ़्त कुछ नहीं मिलता है
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
मौत के डर से ही तो जीवन पलता है
कहीं-न-कहीं छिपा है मर्म जीवन जीने का
सुख के लिए कुछ-न-कुछ दर्द पीने का
फिर भी ऐसे लोग होते हैं
जो कायरों की तरह जीते हैं
जरा भी कष्ट आजाये
तो आंसुओं में बहते हैं
इसीलिए कहता हूँ
संवेदनाओं में रहता हूँ
न छोडो आशाओं का दामन
लक्ष्य बनाये रखो पावन
करो संघर्ष धीर बनके
जीयो जीवन वीर बनके

         - नागेन्द्र दत्त शर्मा

गुरुवार, 5 जून 2014

क्या ये भी कोई न्याय है...???

थी एक समय की बात
कहीं से उड़कर आया
एक अद्भुत नन्हा सा बीज
और गिरा धरती पर
पड़ा रहा निश्चल
न जाने कितने समय
खाता रहा थपेड़े
धूप-हवा-बरसात के
आये कितने आंधी-तूफ़ान मगर
फिर भी पड़ा रहा अनजाने में
निर्भीक एवं बेसुध
धूल-मिट्टी की परत-दर-परत
चढ़ती गयी उस पर अनगिनत
फिर यकायक
जाग पड़ता है नींद से
अंकुरित होता है
कोंपले फूट जाती हैं
धीरे-धीरे निकलते हैं
नये कोमल हरित पल्लव
अंगड़ाई लेता है
नयी शाखाओं के साथ
रूप बदलता है एक नन्हे पौधे का
नीले आसमान के नीचे
मिलती है एक स्वच्छ सांस
स्नेहिल आभास
पर दूर-दूर तक
नहीं दीखता कोई संगी-साथी
हाँ कुछ पास में थे बडे वृक्ष अवश्य
जो लुटाते थे अपना वात्सल्य
खुश था वो इस खुले आकाश के नीचे
न था किसी तरह के डर का अहसास
छोटे-छोटे जीव उससे प्यार करते थे
लिपटते थे उससे बार-बार
एक दिन उधर से कुलांचे भरते हुए
पैरों तले रौंद कर निकल गया
एक जंगल का अपरिचित जीव और
आहत कर गया नन्हे पौधे को 
पहली बार उसे दर्द का अहसास हुआ
अब किसी भी आहट पर
वह यकायक चौंक पड़ता था
सिमट-सिमट जाता था
भय से थरथराता था परन्तु
प्रकृति की गोद में बढ़ता गया
संकटों को समझता गया
बचपन की चौखट पारकर
जवानी के प्रांगण में पला-बढ़ा
और बढ़ता ही गया कई सालों तक
अनेक जीवों-पशु-पक्षियों से पाला पड़ा
जिनमे कुछ उसके मित्र थे
अब वो बहुतों की छाया था
बहुतों का आसरा था परन्तु-
एक दिन वह काँप गया थर-थर
जब अपने सामने के एक वृक्ष को
कुछ लोगों ने काट गिराया
तब उसके मन को आशंका ने घेरा
न जाने कब नंबर आजाये मेरा
मगर वह तो असहाय था
एक ही जगह स्थिरता का पर्याय था
इंतजार ही उसकी नियति थी
मनुष्य की क्रूरता के आगे
नियति भी खामोश थी
फिर उसके हाथ में क्या था
जंगल के कानून के आधीन था
संकटों को झेलना
दूसरों पर उपकार करना
और अंत में कट कर
अपनी बलि दे देना
क्या ये उसके भाग्य का लेखा है
पूर्व जन्म के धर्म-कर्म का जोखा है
नहीं है पता किसी को
उस ईश्वर की क्या महिमा
दिखता सब जैसे अन्याय है
मन आशंकित हो कहता है-
क्या ये भी कोई न्याय है?
             -नागेन्द्र दत्त शर्मा










बुधवार, 7 मई 2014

जिंदगी-हक़ीक़त-इश्क़-मौहब्बत के 'हाइकू'


पेश करूं  कैसे
है यादों की सौगात
दिल में बसी।
  •  
किया  उसने
याद मानो मुक़द्दर
बदल गया।
  •  
आखिर तुम्हे
आही गया अंदाज़
रिश्ता निभाने का।
  •  
चन्दन-बदन,
चंचल-चितवन
महके तन-मन।
  •  
घायल  हुआ
दिल तेरी अदा से
एक नज़र में।
  •  
हुई रौशनी
प्यार की, क़ि दिल
रौशन होगया।
  •  
प्यार के रंग
मेरी चाहत के ढंग
दोनों निराले।
  •  
साँझ ढ़ले
शंख बजे, दीप जले
याद आये तेरी।
  •  
कैसे मानलूं
उसका इश्के जुनूँ
था मेरे लिए।
  •  
उसकी चाहत ने
चैन मेरा चुराया
मै क्या करूँ।
  •  
खूबसूरती
ज्यादा बन जाती है
अपनी दुश्मन।
  •  
चांदनी रात में
हाथ तेरे हाथ में
भुलाऊँ कैसे?
  •  
तुझे देखूं  तो
मेरा अक्श आँखों में
ग़ज़ब ढाता है।
  •  
उसने कुछ
ऐसा किया बयां कि
शायरी होगयी।
  •  
इश्क़ ज़ज्बाती
समुन्दर जिसमे  
डूब के जाना।
  •  
सच्चे मित्र जो
दुःख में आये काम
बाकी बेदाम।
  •  
तू ही जन्नत
तू ही प्यार, तू ही
बहार मेरी।
  •  
जीवन भर
सताया प्यार ने
जो  बेवफा था।
  •  
गीत विरह के
गांयें चंचल नैना
ज्यूँ तोता-मैना।
  •  
चंचल चितवन
महके जीवन, क्या
रूप सलोना ?
  •  
दर्दे-जिगर
दर्दे-वफ़ा, फिरभी
सतायें आप ?














'हाइकू' में दुःख-सुख-अंधियारा-उजियारा

ताक़त का ग़रूर
किसी-2 में जरूर 
न सारे मग़रूर।
  •  
सोचोगे अच्छा
पाओगे अच्छा  तो
होगा  भी अच्छा।
  •  
जिसके दिल में
दूसरों के लिये मान
है वही इंसान।
  •  
किया मज़ाक
संजीदगी पर वो
खिलखिलाया।
  •  
रात में सन्नाटा
चीखता बेदर्दी से
जैसे कुत्ता कोई।
  •  
कटु वचन
बनादे दोस्त-दुश्मन
बिंधे ये  मन।
  •  
जाने कौन था
काली रात के साये में
क्या  मेरा डर?
  •  
काँटों की डगर पे
रस्ते का पत्थर जैसा
मेरा जीवन।
















मंगलवार, 6 मई 2014

प्रकृति पर 'हाइकू'

खग बोले तो
जीवन डोले अनोखी 
प्रातः बेला  मे।
  •  
मेघ नभ में
चाँद-तारे बिचारे
छिपते फिरें।
  •  
इधर तेज़
उधर तम, दोनों
पक्ष सिक्के के।
  •  
रात ने जन्मा
उजाला, रंज क्यों
बिछड़ने का ?
  •  
निशा के जाते
लायी उषा रवि को
स्व-आँचल में।
  •  
सीख  बया की
बन्दर को, घोंसला
गंवाना पड़ा।
  •  
एक दीये में
जलके तेल-बाती
तेज़ फैलाती।
  •  
वादा निभाने
तोड़ लाया टुकड़े
मानव चाँद से।
  •  
संध्या आयी तो
निशा भी लाएगी
सौगात उषा की।











मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

"मन तरसता है"

कभी एकांत में बैठे-बैठे
चला जाता हूँ यथार्थ से
कल्पना लोक में
कहीं दूर-बहुत दूर
सपनों की दुनिया में
अचानक स्मृति पटल पर
एक  दृश्य उभरता है
चलने लगती है जैसे रील
सिनेमा की तरह
उभरता है बचपन का
एक अनूठा एहसास 
गाँव की सर्दियों के मौसम में
रिमझिम बरखा की
एक अद्भुत फुहार
जो धीरे-धीरे बदल जाती थी
यकायक हिमपात के दृश्य में
एक अद्भुत जादू की तरह
बरखा की शीतल बूंदें
हो जातीं थी तबदील उड़ते हुए
श्वेत रुई के फाहों के सदृश जिन्हे
देखकर आंखें होती थी विस्फारित
विस्मित आनंद का अनूठा एहसास
आज भी जिसका सुखद आभास
साकार हो उठता है मेरे तन-मन में
फिर क्या नजारा होता था बाहर का
रात के बाद भोर के उजाले में
दिखती थी एक उज्ज्वल अनुपम छटा
हिम निर्मित पर्वत माला  की जो
बन जाती थी मेरे मकान की लम्बाई में
रात भर होते हिमपात से
पाषाणी छज्जों से फिसलकर
भोर में दरवाजा खोलते ही
बाहर आने का रास्ता होजाता था बंद
और तब निकलती थी
एक उल्लसित सी किलकारी
अबोध शिशु मन-मुख से प्रफुल्लित होकर
मानो आगया हो सारा संसार मुटठी  में
अपने ही घर के आँगन में प्रकृति की
इस अजब छटा को देखकर
शिशु -मन भरता था
जाने कितनी कुलांचे
मानों किसीने जादू फेरा हो
मेरे घर के चारों ओर
मन जैसे उड़-उड़ जाता था
बर्फ़ से ढके हरियाले
खेतो में, खलिहानों में
वनों में, नदी-नालों में
झरनों में ताल-तलैयों में
पर्वत-श्रृंखलाओं में
घनेरे बादलों की
अनूठी आकृतियों में
हरे-भरे पेड़-पौधों में
चहचहाते, कोलाहल करते
रंग-बिरंगे पक्षियों में और
फिर जैसे दृश्य बदलता था
सूर्य निकलने लगता था
जिसकी  सुखद स्वर्णिम आभा
फैलाती थी सुनहली किरणे
एक विशाल श्वेत हिम चादर पर
जिसकी न थी लम्बाई-चौड़ाई
न थी कोई थाह, न कोई सीमा
 केवल एक अनंत विस्तार
दृष्टि जहाँ तक भी जाती थी
देखती थी पेड़ो पर झूलती सी
बर्फ की ही पत्तियां-टहनियां
जिनसे टपकता रहता था
शीतल हिम रस  जबतक
सूर्यदेव  चमकते रहते थे
दृश्य बदलते रहते थे
निर्मित होजातीं थी
असंख्य जल-धाराएं धीरे-धीरे
लौटती थी फिर हरियाली
अपने स्वाभाविक रूप में
चटकीली धूप की सुखद गरमाई से
मिलता था एक अप्रतिम आनंद
बंध जाता था एक अद्भुत शमां
कुदरत का कैसा नूर बरसता है
जबभी यादोँ का सैलाब छलकता है
उसके लिए आज भी मन तरसता है

                        - नागेन्द्र दत्त शर्मा


























वक़्त-दुःख-सुख-जीवन-मृत्यु -ईश्वर पर 'हाइकू'

उसकी सत्ता महान
सर्वज्ञता, वत्सलता महान
कौन है वह?
  •  
भिखारी दर पे
ख़ुदा भी हो सकता है
ख़ाली  न भेज।
  •  
समझ जाओ
सत्यं, शिवं, सुंदरम की है
सारी महिमा।
  •  
ईश्वर-अर्चना
पत्र, पुष्प, जल से
सिद्धि भावना से।
  •  
जन्मा है जो
मृत्यु भी निश्चित
फिर भय कैसा ?
  •  
मंदिर-मस्जिद
गिरजा-गुरुद्वारा 
ख़ुदा मिला कहीं ?
  •  
ये अजब दुनिया
जिसने भी बनायीं
समझ आयी ?
  •  
बहा ले जाता
सैलाब रंजो-गम सब
इंसानी खुशियां।
  •  
जीवन-पड़ाव
हर बार नए अन्दाज़
सिखातें सबको ।
  •  
उमंगें पूरी हों न हों
मिलता मानव जीवन
मुश्किल से।
  •  
संजीदगी का दानव
नहीं निकलता यूँ ही
मानव मन से।
  •  
संवारी यहां
जितनी जीवन-यादें
कैसे मिटादें ?
  •  
जीवन-रंग
मिलते किस्मत के संग
मत हो दंग ।
  •  
तुझको मिला
तेरा नसीब, मुझे मिला
तो क्यों गिला ?
  •  
दुःख के पल
आयें हैं जाएंगे भी
तू चल-न-चल।
  •  
वक़्त ने किया
जब वक़्त पे ताकीद
अब रो के फ़ायदा ।
  •  
कांटों की डगर पे
रास्ते का पत्थर जैसा
मानव जीवन।
  •  
वक़्त का पहिया
न रुके, रोक सको तो
रोक लो भैया।
  •  
अपनी विपदा
हम सब आप ही जाने
कोई क्यों पहचाने।
  •  
बीतेंगे दुःख के पल
समझौता होगा गमों से
लौटेंगी खुशियां सारी।
  •  
मर्म ये मिलता है
मौत के डर से ही तो
जीवन चलता है ।
  •  
सुख तभी पाओगे
दुःख के सागर में जब
गोते लगाओगे ।
  •  
जीवन के रंग
हो जाते बदरंग सारे
दुःखों के संग।
  •  
समय का उस्तरा
करे आलसी का भाग्य
केश-विहीन।
  •  
समय का चक्र
कभी ऊपर कभी नीचे
परिवर्तन प्रतिपल।
  •  
ग्रहों की चाल
शनि की वक्र दृष्टि
अच्छे-२  बेहाल।










सोमवार, 28 अप्रैल 2014

पर्यावरणीय 'हाइकू'

वृक्ष लगेंगे
मेघ बरसेंगे, रक्षित
मिटटी-पानी।
  •  
रहेगा कैसे
पर्यावरण जिन्दा, जो
आँगन गन्दा ?
  •  
मिलके आओ
धरापे वृक्ष लगाओ
पर्यावरण बचाओ।
  •  
प्लास्टिक करे
धरा को बंजर, न
माने मानव?
  •    
करो भू- श्रृंगार
उगाओ हरे वन
संवारो जीवन।
  •  
बरखा आये
हरियाली लहलहाये
वृक्ष कर पायें।
  •  
पेड़-पौधे हैं 
धरा की सच्ची शान
मानव-आन।
  •  
अमानुषी राज
प्रदूषणीय समाज
पनपे आज ?
  •  
पर्यावरण की
ता-ता-थैय्या, बचें पोखर
ताल-तलैया।
  •  
वन घनेरा
खग-मृगों का डेरा
जीवन-सवेरा।
  •  
लिपटते मेघ 
पर्वतों से, लगती
छटा निराली।
  •  
भवन बने
कृषि-भूमिपे, उपजे
अन्न कहां ?
  •  
वन-पहाड़
पशु-पक्षी-रक्षण
है पर्यावरण।

 - नागेन्द्र दत्त शर्मा










'प्रकृति' पर 'हाइकू'


खग बोलें तो
जीवन डोले अनोखी
प्रातः बेला  में।
  •  
बासंती-रंग
सतरंगे फूलों-संग
हो मन दंग।
  •  
भ्रमर गायें
कलियाँ चटकायें
मस्त फ़िज़ा में ।
  •  
कभी अँधेरा
कभी उजाला, दोनों
पक्ष सिक्के के।
  •  
मिलके तेल-बाती
एक दीपक में प्रकाश
अपना फैलाती।
  •  
उषा धवल 
संध्या निर्मल, पर क्यों 
निशा श्यामल ?
  •  
निशा ने जन्मा 
उजाले को, बिछड़ने का
फिर मलाल क्यों ?
  •  
संध्या आई तो
निशा भी आयेगी लेके
सौगात में उषा को ।
  •  
सावन का अँधेरा
जुगनू भेदे अपनी
टॉर्च चमका के ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघा भड़के, रोये 
बरखा रानी ?
  •  
रिमझिम फुहार
बनके बहार लाई
सुकून सावन में।
  •  
मेघां गरजें
बिजली कड़के, सावन
फिर क्यों तरसें ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघां  गरजें, नीर बरसें
धरा प्यास बुझाये।
  •  
रिमझिम फुहार से
सावन ने सजाई
हरियाली कैसे?



रविवार, 20 अप्रैल 2014

सूरज -चाँद - सितारोँ पर - 'हाइकू'


क्या है 'हाइकू'?
गागर में सागर जैसा
सूक्षम सन्देश।

'हाइकू' एक विचार
है मर्म पे प्रहार
न करे तलवार।

'हाइकू' है ज्ञान
दे शब्द-सम्मान
हों सब हैरान

'हाइकू’ के शब्द
करे लक्ष्य पे वार
न करे तलवार। 
  •  
हाइकू एक
रंगीन पुष्प गुच्छ
देख मन स्वच्छ।
  •  
फ़लक़ पे
सूरज -चाँद -सितारे
कितने सारे !

चाँद सितारे
वादा कर लाया कौन
कितने सारे?

चंदा भी है
सूरज भी है यहाँ
एक तेरे सिवा।

रवि के होते अस्त
श्याम चदरिया
बिछ जाती सर्वत्र।

निशा के होते अंत
रवि प्रकट तुरंत
उषा की  गोद में।

सूरज ढूंढ़ता है
चाँद को हमेशा मगर
दीदार कभी-कभी।

चाँद-सूरज है
माता-पिता जैसे
सभी सितारों के।

चन्द्र की शीतलता
सूर्य की ऊष्णता-दोनों
जीवन- आवश्यकता।
  •  
सूरज के बिना 
नहीं जीवन, है मरण
यहाँ जीवोँ  का । 
  •  
तू कहे तो 
तोड़ ला दूँ चंदा-
सूरज अभी। 
  •  
तू ही चंदा
तू ही सूरज और
धड़कन है।

सूर्य सी ख्याति
चन्द्र सी शीतलता 
मानव  देवता। ।
  •  
निकाह चाँद-
सूरज का, निकली
बरात तारों की ।
  •  
ब्याह रचाने
निशा से चाँद लाया
बारात तारों की ।
  •  
सूर्य-डर से
चाँद छिपे निशा के
पहलू में ही ।
  •  
चाँद - सितारों से
आगे कैसा है, क्या है?
किसने देखा ?
  •  
सूर्य - विम्ब
दिखा था फल-सरीखा
शिशु कपीश को।
  •  
वादा पूरा हो
तोड़ लाया टुकड़े असली
मानव चाँद से ।
  •  
घूँघट खोलें
स्वर्णिम रवि-रश्मियां 
बेताब उषा का।
  •  
 नभ में मेघ
छिपते फिरें सारे
रवि-चाँद-तारे।
  •  
ब्याह निशा से
चाँद लाया बारात
जग-मग तारों की।
  •  
सूर्य के आगे
जो भी दीपक राखे
कौन बताएं वाके।
  •  
मानव खोजे
सूर्य-चन्द्रादि ग्रह
स्पेस-कुंडली में।