गुरुवार, 5 जून 2014

क्या ये भी कोई न्याय है...???

थी एक समय की बात
कहीं से उड़कर आया
एक अद्भुत नन्हा सा बीज
और गिरा धरती पर
पड़ा रहा निश्चल
न जाने कितने समय
खाता रहा थपेड़े
धूप-हवा-बरसात के
आये कितने आंधी-तूफ़ान मगर
फिर भी पड़ा रहा अनजाने में
निर्भीक एवं बेसुध
धूल-मिट्टी की परत-दर-परत
चढ़ती गयी उस पर अनगिनत
फिर यकायक
जाग पड़ता है नींद से
अंकुरित होता है
कोंपले फूट जाती हैं
धीरे-धीरे निकलते हैं
नये कोमल हरित पल्लव
अंगड़ाई लेता है
नयी शाखाओं के साथ
रूप बदलता है एक नन्हे पौधे का
नीले आसमान के नीचे
मिलती है एक स्वच्छ सांस
स्नेहिल आभास
पर दूर-दूर तक
नहीं दीखता कोई संगी-साथी
हाँ कुछ पास में थे बडे वृक्ष अवश्य
जो लुटाते थे अपना वात्सल्य
खुश था वो इस खुले आकाश के नीचे
न था किसी तरह के डर का अहसास
छोटे-छोटे जीव उससे प्यार करते थे
लिपटते थे उससे बार-बार
एक दिन उधर से कुलांचे भरते हुए
पैरों तले रौंद कर निकल गया
एक जंगल का अपरिचित जीव और
आहत कर गया नन्हे पौधे को 
पहली बार उसे दर्द का अहसास हुआ
अब किसी भी आहट पर
वह यकायक चौंक पड़ता था
सिमट-सिमट जाता था
भय से थरथराता था परन्तु
प्रकृति की गोद में बढ़ता गया
संकटों को समझता गया
बचपन की चौखट पारकर
जवानी के प्रांगण में पला-बढ़ा
और बढ़ता ही गया कई सालों तक
अनेक जीवों-पशु-पक्षियों से पाला पड़ा
जिनमे कुछ उसके मित्र थे
अब वो बहुतों की छाया था
बहुतों का आसरा था परन्तु-
एक दिन वह काँप गया थर-थर
जब अपने सामने के एक वृक्ष को
कुछ लोगों ने काट गिराया
तब उसके मन को आशंका ने घेरा
न जाने कब नंबर आजाये मेरा
मगर वह तो असहाय था
एक ही जगह स्थिरता का पर्याय था
इंतजार ही उसकी नियति थी
मनुष्य की क्रूरता के आगे
नियति भी खामोश थी
फिर उसके हाथ में क्या था
जंगल के कानून के आधीन था
संकटों को झेलना
दूसरों पर उपकार करना
और अंत में कट कर
अपनी बलि दे देना
क्या ये उसके भाग्य का लेखा है
पूर्व जन्म के धर्म-कर्म का जोखा है
नहीं है पता किसी को
उस ईश्वर की क्या महिमा
दिखता सब जैसे अन्याय है
मन आशंकित हो कहता है-
क्या ये भी कोई न्याय है?
             -नागेन्द्र दत्त शर्मा










कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें