मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

"मन तरसता है"

कभी एकांत में बैठे-बैठे
चला जाता हूँ यथार्थ से
कल्पना लोक में
कहीं दूर-बहुत दूर
सपनों की दुनिया में
अचानक स्मृति पटल पर
एक  दृश्य उभरता है
चलने लगती है जैसे रील
सिनेमा की तरह
उभरता है बचपन का
एक अनूठा एहसास 
गाँव की सर्दियों के मौसम में
रिमझिम बरखा की
एक अद्भुत फुहार
जो धीरे-धीरे बदल जाती थी
यकायक हिमपात के दृश्य में
एक अद्भुत जादू की तरह
बरखा की शीतल बूंदें
हो जातीं थी तबदील उड़ते हुए
श्वेत रुई के फाहों के सदृश जिन्हे
देखकर आंखें होती थी विस्फारित
विस्मित आनंद का अनूठा एहसास
आज भी जिसका सुखद आभास
साकार हो उठता है मेरे तन-मन में
फिर क्या नजारा होता था बाहर का
रात के बाद भोर के उजाले में
दिखती थी एक उज्ज्वल अनुपम छटा
हिम निर्मित पर्वत माला  की जो
बन जाती थी मेरे मकान की लम्बाई में
रात भर होते हिमपात से
पाषाणी छज्जों से फिसलकर
भोर में दरवाजा खोलते ही
बाहर आने का रास्ता होजाता था बंद
और तब निकलती थी
एक उल्लसित सी किलकारी
अबोध शिशु मन-मुख से प्रफुल्लित होकर
मानो आगया हो सारा संसार मुटठी  में
अपने ही घर के आँगन में प्रकृति की
इस अजब छटा को देखकर
शिशु -मन भरता था
जाने कितनी कुलांचे
मानों किसीने जादू फेरा हो
मेरे घर के चारों ओर
मन जैसे उड़-उड़ जाता था
बर्फ़ से ढके हरियाले
खेतो में, खलिहानों में
वनों में, नदी-नालों में
झरनों में ताल-तलैयों में
पर्वत-श्रृंखलाओं में
घनेरे बादलों की
अनूठी आकृतियों में
हरे-भरे पेड़-पौधों में
चहचहाते, कोलाहल करते
रंग-बिरंगे पक्षियों में और
फिर जैसे दृश्य बदलता था
सूर्य निकलने लगता था
जिसकी  सुखद स्वर्णिम आभा
फैलाती थी सुनहली किरणे
एक विशाल श्वेत हिम चादर पर
जिसकी न थी लम्बाई-चौड़ाई
न थी कोई थाह, न कोई सीमा
 केवल एक अनंत विस्तार
दृष्टि जहाँ तक भी जाती थी
देखती थी पेड़ो पर झूलती सी
बर्फ की ही पत्तियां-टहनियां
जिनसे टपकता रहता था
शीतल हिम रस  जबतक
सूर्यदेव  चमकते रहते थे
दृश्य बदलते रहते थे
निर्मित होजातीं थी
असंख्य जल-धाराएं धीरे-धीरे
लौटती थी फिर हरियाली
अपने स्वाभाविक रूप में
चटकीली धूप की सुखद गरमाई से
मिलता था एक अप्रतिम आनंद
बंध जाता था एक अद्भुत शमां
कुदरत का कैसा नूर बरसता है
जबभी यादोँ का सैलाब छलकता है
उसके लिए आज भी मन तरसता है

                        - नागेन्द्र दत्त शर्मा


























वक़्त-दुःख-सुख-जीवन-मृत्यु -ईश्वर पर 'हाइकू'

उसकी सत्ता महान
सर्वज्ञता, वत्सलता महान
कौन है वह?
  •  
भिखारी दर पे
ख़ुदा भी हो सकता है
ख़ाली  न भेज।
  •  
समझ जाओ
सत्यं, शिवं, सुंदरम की है
सारी महिमा।
  •  
ईश्वर-अर्चना
पत्र, पुष्प, जल से
सिद्धि भावना से।
  •  
जन्मा है जो
मृत्यु भी निश्चित
फिर भय कैसा ?
  •  
मंदिर-मस्जिद
गिरजा-गुरुद्वारा 
ख़ुदा मिला कहीं ?
  •  
ये अजब दुनिया
जिसने भी बनायीं
समझ आयी ?
  •  
बहा ले जाता
सैलाब रंजो-गम सब
इंसानी खुशियां।
  •  
जीवन-पड़ाव
हर बार नए अन्दाज़
सिखातें सबको ।
  •  
उमंगें पूरी हों न हों
मिलता मानव जीवन
मुश्किल से।
  •  
संजीदगी का दानव
नहीं निकलता यूँ ही
मानव मन से।
  •  
संवारी यहां
जितनी जीवन-यादें
कैसे मिटादें ?
  •  
जीवन-रंग
मिलते किस्मत के संग
मत हो दंग ।
  •  
तुझको मिला
तेरा नसीब, मुझे मिला
तो क्यों गिला ?
  •  
दुःख के पल
आयें हैं जाएंगे भी
तू चल-न-चल।
  •  
वक़्त ने किया
जब वक़्त पे ताकीद
अब रो के फ़ायदा ।
  •  
कांटों की डगर पे
रास्ते का पत्थर जैसा
मानव जीवन।
  •  
वक़्त का पहिया
न रुके, रोक सको तो
रोक लो भैया।
  •  
अपनी विपदा
हम सब आप ही जाने
कोई क्यों पहचाने।
  •  
बीतेंगे दुःख के पल
समझौता होगा गमों से
लौटेंगी खुशियां सारी।
  •  
मर्म ये मिलता है
मौत के डर से ही तो
जीवन चलता है ।
  •  
सुख तभी पाओगे
दुःख के सागर में जब
गोते लगाओगे ।
  •  
जीवन के रंग
हो जाते बदरंग सारे
दुःखों के संग।
  •  
समय का उस्तरा
करे आलसी का भाग्य
केश-विहीन।
  •  
समय का चक्र
कभी ऊपर कभी नीचे
परिवर्तन प्रतिपल।
  •  
ग्रहों की चाल
शनि की वक्र दृष्टि
अच्छे-२  बेहाल।










सोमवार, 28 अप्रैल 2014

पर्यावरणीय 'हाइकू'

वृक्ष लगेंगे
मेघ बरसेंगे, रक्षित
मिटटी-पानी।
  •  
रहेगा कैसे
पर्यावरण जिन्दा, जो
आँगन गन्दा ?
  •  
मिलके आओ
धरापे वृक्ष लगाओ
पर्यावरण बचाओ।
  •  
प्लास्टिक करे
धरा को बंजर, न
माने मानव?
  •    
करो भू- श्रृंगार
उगाओ हरे वन
संवारो जीवन।
  •  
बरखा आये
हरियाली लहलहाये
वृक्ष कर पायें।
  •  
पेड़-पौधे हैं 
धरा की सच्ची शान
मानव-आन।
  •  
अमानुषी राज
प्रदूषणीय समाज
पनपे आज ?
  •  
पर्यावरण की
ता-ता-थैय्या, बचें पोखर
ताल-तलैया।
  •  
वन घनेरा
खग-मृगों का डेरा
जीवन-सवेरा।
  •  
लिपटते मेघ 
पर्वतों से, लगती
छटा निराली।
  •  
भवन बने
कृषि-भूमिपे, उपजे
अन्न कहां ?
  •  
वन-पहाड़
पशु-पक्षी-रक्षण
है पर्यावरण।

 - नागेन्द्र दत्त शर्मा










'प्रकृति' पर 'हाइकू'


खग बोलें तो
जीवन डोले अनोखी
प्रातः बेला  में।
  •  
बासंती-रंग
सतरंगे फूलों-संग
हो मन दंग।
  •  
भ्रमर गायें
कलियाँ चटकायें
मस्त फ़िज़ा में ।
  •  
कभी अँधेरा
कभी उजाला, दोनों
पक्ष सिक्के के।
  •  
मिलके तेल-बाती
एक दीपक में प्रकाश
अपना फैलाती।
  •  
उषा धवल 
संध्या निर्मल, पर क्यों 
निशा श्यामल ?
  •  
निशा ने जन्मा 
उजाले को, बिछड़ने का
फिर मलाल क्यों ?
  •  
संध्या आई तो
निशा भी आयेगी लेके
सौगात में उषा को ।
  •  
सावन का अँधेरा
जुगनू भेदे अपनी
टॉर्च चमका के ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघा भड़के, रोये 
बरखा रानी ?
  •  
रिमझिम फुहार
बनके बहार लाई
सुकून सावन में।
  •  
मेघां गरजें
बिजली कड़के, सावन
फिर क्यों तरसें ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघां  गरजें, नीर बरसें
धरा प्यास बुझाये।
  •  
रिमझिम फुहार से
सावन ने सजाई
हरियाली कैसे?



रविवार, 20 अप्रैल 2014

सूरज -चाँद - सितारोँ पर - 'हाइकू'


क्या है 'हाइकू'?
गागर में सागर जैसा
सूक्षम सन्देश।

'हाइकू' एक विचार
है मर्म पे प्रहार
न करे तलवार।

'हाइकू' है ज्ञान
दे शब्द-सम्मान
हों सब हैरान

'हाइकू’ के शब्द
करे लक्ष्य पे वार
न करे तलवार। 
  •  
हाइकू एक
रंगीन पुष्प गुच्छ
देख मन स्वच्छ।
  •  
फ़लक़ पे
सूरज -चाँद -सितारे
कितने सारे !

चाँद सितारे
वादा कर लाया कौन
कितने सारे?

चंदा भी है
सूरज भी है यहाँ
एक तेरे सिवा।

रवि के होते अस्त
श्याम चदरिया
बिछ जाती सर्वत्र।

निशा के होते अंत
रवि प्रकट तुरंत
उषा की  गोद में।

सूरज ढूंढ़ता है
चाँद को हमेशा मगर
दीदार कभी-कभी।

चाँद-सूरज है
माता-पिता जैसे
सभी सितारों के।

चन्द्र की शीतलता
सूर्य की ऊष्णता-दोनों
जीवन- आवश्यकता।
  •  
सूरज के बिना 
नहीं जीवन, है मरण
यहाँ जीवोँ  का । 
  •  
तू कहे तो 
तोड़ ला दूँ चंदा-
सूरज अभी। 
  •  
तू ही चंदा
तू ही सूरज और
धड़कन है।

सूर्य सी ख्याति
चन्द्र सी शीतलता 
मानव  देवता। ।
  •  
निकाह चाँद-
सूरज का, निकली
बरात तारों की ।
  •  
ब्याह रचाने
निशा से चाँद लाया
बारात तारों की ।
  •  
सूर्य-डर से
चाँद छिपे निशा के
पहलू में ही ।
  •  
चाँद - सितारों से
आगे कैसा है, क्या है?
किसने देखा ?
  •  
सूर्य - विम्ब
दिखा था फल-सरीखा
शिशु कपीश को।
  •  
वादा पूरा हो
तोड़ लाया टुकड़े असली
मानव चाँद से ।
  •  
घूँघट खोलें
स्वर्णिम रवि-रश्मियां 
बेताब उषा का।
  •  
 नभ में मेघ
छिपते फिरें सारे
रवि-चाँद-तारे।
  •  
ब्याह निशा से
चाँद लाया बारात
जग-मग तारों की।
  •  
सूर्य के आगे
जो भी दीपक राखे
कौन बताएं वाके।
  •  
मानव खोजे
सूर्य-चन्द्रादि ग्रह
स्पेस-कुंडली में।