चला जाता हूँ यथार्थ से
कल्पना लोक में
कहीं दूर-बहुत दूर
सपनों की दुनिया में
अचानक स्मृति पटल पर
एक दृश्य उभरता है
चलने लगती है जैसे रील
सिनेमा की तरह
उभरता है बचपन का
एक अनूठा एहसास
गाँव की सर्दियों के मौसम में
रिमझिम बरखा की
एक अद्भुत फुहार
जो धीरे-धीरे बदल जाती थी
यकायक हिमपात के दृश्य में
एक अद्भुत जादू की तरह
बरखा की शीतल बूंदें
हो जातीं थी तबदील उड़ते हुए
श्वेत रुई के फाहों के सदृश जिन्हे
देखकर आंखें होती थी विस्फारित
विस्मित आनंद का अनूठा एहसास
आज भी जिसका सुखद आभास
साकार हो उठता है मेरे तन-मन में
फिर क्या नजारा होता था बाहर का
रात के बाद भोर के उजाले में
दिखती थी एक उज्ज्वल अनुपम छटा
हिम निर्मित पर्वत माला की जो
बन जाती थी मेरे मकान की लम्बाई में
रात भर होते हिमपात से
पाषाणी छज्जों से फिसलकर
भोर में दरवाजा खोलते ही
बाहर आने का रास्ता होजाता था बंद
और तब निकलती थी
एक उल्लसित सी किलकारी
अबोध शिशु मन-मुख से प्रफुल्लित होकर
मानो आगया हो सारा संसार मुटठी में
अपने ही घर के आँगन में प्रकृति की
इस अजब छटा को देखकर
शिशु -मन भरता था
जाने कितनी कुलांचे
मानों किसीने जादू फेरा हो
मेरे घर के चारों ओर
मन जैसे उड़-उड़ जाता था
बर्फ़ से ढके हरियाले
खेतो में, खलिहानों में
वनों में, नदी-नालों में
झरनों में ताल-तलैयों में
पर्वत-श्रृंखलाओं में
घनेरे बादलों की
अनूठी आकृतियों में
हरे-भरे पेड़-पौधों में
चहचहाते, कोलाहल करते
रंग-बिरंगे पक्षियों में और
फिर जैसे दृश्य बदलता था
सूर्य निकलने लगता था
जिसकी सुखद स्वर्णिम आभा
फैलाती थी सुनहली किरणे
एक विशाल श्वेत हिम चादर पर
जिसकी न थी लम्बाई-चौड़ाई
न थी कोई थाह, न कोई सीमा
केवल एक अनंत विस्तार
दृष्टि जहाँ तक भी जाती थी
देखती थी पेड़ो पर झूलती सी
बर्फ की ही पत्तियां-टहनियां
जिनसे टपकता रहता था
शीतल हिम रस जबतक
सूर्यदेव चमकते रहते थे
दृश्य बदलते रहते थे
निर्मित होजातीं थी
असंख्य जल-धाराएं धीरे-धीरे
लौटती थी फिर हरियाली
अपने स्वाभाविक रूप में
चटकीली धूप की सुखद गरमाई से
मिलता था एक अप्रतिम आनंद
बंध जाता था एक अद्भुत शमां
कुदरत का कैसा नूर बरसता है
जबभी यादोँ का सैलाब छलकता है
उसके लिए आज भी मन तरसता है
- नागेन्द्र दत्त शर्मा



