हमने कभी भी नहीं सोचा था ऐसे,
अबके धोखा दिया सरकार ने जैसे।
ठगी जाती जनता हर बार क्यों ?
इनकी नई विधि से जाने कैसे।
नए-२ ढंग से हर बार लुभाकर,
वोट सबके उड़ा ले जाती कैसे।
मिलते ही जीत की गद्दी इसको,
बिल्ली से शेर हो जाती कैसे।
हुकूमत चाहे किसी की भी हो,
सब चोर-चोर मौसेरे भाई जैसे।
मिली-जुली सरकार थोड़ी सीधी,
पूरे बहुमत वाली सीना-जोर जैसे।
इनके राज में मंहगाई को देखो,
राहत नहीं किसी को भी कैसे।
पुरातन युगों में चंड-मुंड थे,
इस कलियुग में इनके जैसे।
-नागेन्द्र दत्त शर्मा
अबके धोखा दिया सरकार ने जैसे।
ठगी जाती जनता हर बार क्यों ?
इनकी नई विधि से जाने कैसे।
नए-२ ढंग से हर बार लुभाकर,
वोट सबके उड़ा ले जाती कैसे।
मिलते ही जीत की गद्दी इसको,
बिल्ली से शेर हो जाती कैसे।
हुकूमत चाहे किसी की भी हो,
सब चोर-चोर मौसेरे भाई जैसे।
मिली-जुली सरकार थोड़ी सीधी,
पूरे बहुमत वाली सीना-जोर जैसे।
इनके राज में मंहगाई को देखो,
राहत नहीं किसी को भी कैसे।
इस कलियुग में इनके जैसे।
-नागेन्द्र दत्त शर्मा