मंगलवार, 24 जून 2014

गीत- मै जाग नही पाऊं मै सो नही पाऊं

मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
ये नागिन सी ज़ुल्फ़ें, जब दिल पे लहरायें
और शबनम सी ऑंखें, मदहोशी बरसायें
तो मै तेरे दिलकश, सपनो में खो जाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
जब साँझ लगे ढलने, तो तेरी याद सताए
फिर रात भर आँखों में, नींद कैसे आये
तब प्यार बनके तेरे, ख़्वाबों में रंग जाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं
फ़लक पे चमकते सितारे, तेरी याद दिलाएं
रात में ठंडी हवा के झोंके, मेरा चैन चुराएं
बदलता रहूँ करबटें, फिर सो कैसे पाऊं
मै जाग नही पाऊं, मै सो नही पाऊं
तेरी अदाओं के ही, गीत गुनगुनाऊं

                                -नागेन्द्र दत्त शर्मा

जीवन धारा


चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
चंचल लहरों सा टकरा रहा है, नहीं कोई सहारा
फसी हुई है बीच भंवर में अपनी जीवन नौका
डोल रही है बिन मांझी के, ढूंढ़ रही कोई मौका
साँझ-सवेरे निकल चुके,नज़र न आया सहारा
चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
न मिला कोई जीवन सागर में पार लगाने वाला
न दिखा साथी कोई यहाँ दुःख-सुख बाँटने वाला
जितने भी इस जग में देखे जालिम हैं वो यारां
चल रहा है जीवन मेरा जैसे बहे जल की धारा
                                         -नागेन्द्र दत्त शर्मा




आपके मस्तिष्क के चमत्कार !



आज़   के युग मे  मनुष्य की जिंदगी इतनी व्यस्त होगयी है कि उसे अपने आस-पास सिर्फ़ अपने अतिरिक्त और कोई नहीं दिखाई नहीं देता। आज जबकि  मनुष्य ने इतनी ज्यादा उन्नति करली है कि उसके विचार भी वर्तमान युग की प्रगति  के हिसाब से तथा उसके शिक्षित होने के हिसाब से और अधिक उत्तम होने चाहियें थे, परन्तु ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

जीवन हमारे विचारों और क्रियाओं से संचालित होता है न कि भौतिक तत्वों की निर्भरता पर। यदि हमारे विचार और क्रियाएं दोषपूर्ण हैं तो  मन और शरीर दोनों रुग्ण हो जाते हैं तथा  जब तक उनमे निर्मलता नहीं आजाती  औषधि भी कोई कार्य नहीं करती है। इसलिए सकारात्मक विचारधारा के अवलम्बन पर ही हमारा अवचेतन मन हमारे जीवन को उन्नति के पथ पर अग्रसर करता है।

इस पुस्तक में दी गयी सोच-विचार की तकनीको , विधियों एवं दुनियादारी निभाने की तरकीबों पर  जितने अच्छे ढंग से आप अमल करेंगे उतनी ही जल्दी सफलता की मंजिल तय कर पायेंगे। संक्षेप में अगर सार की बात कहें तो यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच का मामला है की वह किस तरह वह अपनी जिंदगी जीता है।

 मानव मस्तिष्क के अन्तर्गत उसका अवचेतन मस्तिष्क एक कभी न खत्म होने वाली कहानी की ही तरह हमेशा बिना थके, बिना रुके कार्य करता रहता है। आप अच्छे विचार अपनायेंगे  तो आपका जीवन ख़ुशहाल बनेगा, बुरे विचार अपनायेंगे तो आपका जीवन दुःखदायी  हो जायेगा क्योंकि यह आपकी  अपनी सोच का ही अविश्वसनीय परिणाम है।


बहुत से लोगों ने यह परखा अथवा अनुभव भी किया होगा की जैसे ही आप अपनी सोच बदलते हैं, आपकी जीवनधारा भी नया मोड़  लेलेती  है और उसके पश्चात आप प्रगति के नए रास्तों पर चलने लगते हैं और उन्नति के नये -नये शिखर छूने लगते हैं।  सकारात्मक सोच के  मालिक हैं उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से और भी ज्यादा सफलता प्राप्त  वाली है।  

आइये अब आपको सफलता की  मंज़िल की  ओर ले चलते हैं। 





मंगलवार, 17 जून 2014

सिक्के के दो पहलू

कहते हैं लोग इस जहां में
इक 'हाँ' है तो इक 'ना' भी है
इक फूल है तो इक कांटा भी है
जहाँ अमृत है वहां विष भी है
अगर दिन है तो रात भी है
अँधेरा है तो उजाला भी है
उदय है तो अवसान भी है
जहाँ धूप है वहां छाँव भी है
सुबह है तो फिर साँझ भी है
जीवन भी है तो मरण भी है
भलाई है तो बुराई भी है
वक्रता है तो सीधाई भी है
आग है तो पानी भी है
हर एक कहानी में भैया
राजा है तो रानी भी है
चोर है तो सिपाही भी है
प्रत्येक यात्रा वृतान्त में 
मंजिल है तो राही भी है
इस जग में सदा विद्यमान
रहेंगे ही शास्वत दो प्रतिमान
हर चेहरे पे जैसे नाक और कान
सोचें तो मानव की बस ये ही शान
देखे होंगे आपने भी अद्भुत रंग
कर देते हैं जो कभी सभी को दंग
महसूसे होंगे कुछ दुःख के पल
खुशियों और कुछ सुख के पल
रंग-बिरंगे हसीन सतरंगे पल
बीत गया जो इक वो भी कल 
और आने वाला इक वो भी कल
आज ही नहीं जब शेष हुआ
अभी तक जो आया ही नहीं 
वो कैसे फिर विशेष हुआ
मन में वो आशाओं का दीप
जब तक भी प्रदीप्त रहे
तब तक उत्कट अभिलाषा
जीवन की अतृप्त पिपासा
जीने के लिए ही दीप्त रहे
वर्ना बुझ गयी अगर वो प्यास
हो जायेगा सब कुछ समाप्त
जिसका आशय है हमसे
हमारी जीवंतता समाप्त
हमारा उद्द्येश्य समाप्त
हमारा लक्ष्य समाप्त
सारी आकांक्षायें समाप्त
जड़वत पाषाण सदृश
पाषाण जो एक दम स्थिर  
न कोई भाव, न भंगिमा
न विचार, न संवेदना के स्वर
जीवन है तो सब कुछ
नहीं तो सब कुछ निरर्थक
सिक्के के दोनों पहलू 
जो यहाँ पूर्ण सार्थक
एक अकथनीय कहानी
अपने-अपने अर्थों में पूर्ण सार्थक
अपने-अपने पक्षों पर पूर्ण भारी
बिलकुल रस्सा-कस्सी जैसा दृश्य 
कभी कोई इस पार
कभी कोई उस पार
दोनों के अपने-अपने मूल्य 
दोनों की अपनी -अपनी पहचान
समवेत स्वरों का गुंजन
प्रतिस्पर्धात्मक नज़ारा
जाज्वल्यमान चेहरे
इक-दूजे की आस्था के स्तम्भ
तर्क-संगत निर्णयक क्षमता 
वाह ! तू धन्य है प्रकृति
तेरा खेल ही है न्यारा
संघर्षपूर्ण वातावरण का सृजन
लयबद्ध ताल-छंद और गति
धन्य प्रभु ! तेरी ऐसी समृद्धि
                 -नागेन्द्र दत्त शर्मा






मंगलवार, 10 जून 2014

ग़ज़ल - मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग...

मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग
नित करते गलत धन का भोग
बाहर से दिखती मौज ही मौज
पर भीतर से खाते रोग ही रोग
कभी नहीं की मदद किसी की
पर धन का तो करते रहते योग
न्याय किसी से भी किया नहीं
अपनी बारी में अब कैसा ढोंग
नहीं झांकते गिरेबां में अपने
क्यों जलते देख औरों का जोग
चंद दिनों की ही तो जिंदगी है
करलो थोड़ा इसका सदुपयोग
धर्म-कर्म तो भुला ही दिया है
जाने क्यों बिक जाते हैं लोग
तुमने क्या सोचा है 'नागेन्द्र'
किस इलाज़ से भागेगा रोग
            -नागेन्द्र दत्त शर्मा 

एक दिन सवेरे घर से निकल कर..

एक दिन सवेरे घर से निकल कर 
चला जा रहा था मैं कदम बढाकर 
बेसुध होकर कल्पनाओं में खोकर 
बढ़ा जा रहा था कंटीली डगर पर 
सपनो की कागजी नाव बनाकर 
विचारों के सागर में डूब-उतराकर 
पतवार बिना नाविक को बिठाकर 
शंकाओं के भंवर में खुद को डुबोकर 
नजरें कहीं शून्य में स्थिर जमाकर 
बिना लक्ष्य के जैसे तीर चलाकर 
स्वयं को मोह-माया में फंसा कर 
जिंदगी को पूर्ण निरर्थक बनाकर 
जीवन की उबड़-खाबड़ डगर पर 
कैसे सुनाऊं ये अफ़साना बनाकर 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 










रविवार, 8 जून 2014

ग़ज़ल- मैंने जितने भी साल बिताये यहाँ .....

जितने भी साल मैंने बिताये यहाँ
जीवन के अनमोल पल सजाये यहाँ 
एक नयी डगर पर जब पड़े कदम 
लेकर वही मुझको चले आये यहाँ 
कितने मेले लगे इस जिंदगी में 
कितने सबक सीखे-सिखाये यहाँ  
हर कोई आया जिंदगी के सपने सजाने 
सपना भी सभी का न पूरा हो पाये यहाँ  
जितनी यादें संजोकर रखी दिल मे 
कैसे कोई उनको मिटा पाये यहाँ 
न जाने कैसे किससे कब रिश्ता बना 
आज तक भी कोई न समझ पाये यहाँ 
तरह-तरह के लोग मिले इस जगह 
होली के रंग हो जैसे बिखराये यहाँ 
एक अंजानी सी चाहत दिल में लिए 
न चाहते हुए सभी रुखसत पाये यहाँ 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 

शनिवार, 7 जून 2014

हवाई-महल


क्यों खो देते हो तुम वज़ूद अपना

जमीनी हकीकत को भुलाकर
निगाहें तो रहती हैं हरदम फ़लक पे
मगर पैर जमीं पर टिकते नहीं
चाहत तो है चाँद को पाने की मगर
क़ाबलियत छत पर जाने की भी नहीं
क्या ये सच नहीं ? अगर सच है तो-
समझो तो पहले अपने आप को
सोचो आगा-पीछा अपना, सम्भालो होश
देखो किधर है कुवां - किधर खाई ?
फिर भरो दम अपने में इत्मीनान से
कुछ पाने के लिए रखो हौसला
हो ठीक से पता मंज़िल का
हो इरादा भी नेक और पक्का तो
मिल जाती है फतह अपने आप ही
क्योंकि राह दिखाने वाला जानता है  
कि कौन कितने पानी में है ?
किसकी नीयत कैसी है, इरादा क्या है ?
किसे कहाँ पहुँचाना है ?
क्योंकि तुम क्या 'नागेन्द्र' सभी तो
उसके हाथों की कठपुतलियां ही हैं
जिनकी सारी डोरियाँ उसके ही हाथों में हैं
कोई नहीं जानता वह कब कौन से
हाथ की, पैर की या गर्दन की डोर या
सारी डोरियाँ एक साथ खीँच ले
जब तक की उसका जी नहीं भरता
तभी तक तुम अपने पर गरूर कर सकते हो
वरना तुम्हारी औकात ही क्या है ?
जोड़ो हक़ीक़त से वास्ता अपना
बंद करो देखना रोज नया सब्ज़बाग
तलाशो अपनी सही मंजिल
क्योंकि जो दिखाई देता है
वह हमेशा सच नहीं होता
"हवाई-महल" बनाकर कभी
जीवन सफल नहीं होता
हमेशा सपनो की दुनिया में रहकर
कोई भी सपना सच नहीं होता
तुम बनाओ अपना लक्ष्य कर्म को
छोडो फल की इच्छा, समझो मर्म को
कर्म करके ही जीत मिलती है
मेहनत से ही ज़िंदगी संवरती है
भाग्य के सहारे पेट नहीं पलता है
दुनिया में मुफ़्त कुछ नहीं मिलता है
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
मौत के डर से ही तो जीवन पलता है
कहीं-न-कहीं छिपा है मर्म जीवन जीने का
सुख के लिए कुछ-न-कुछ दर्द पीने का
फिर भी ऐसे लोग होते हैं
जो कायरों की तरह जीते हैं
जरा भी कष्ट आजाये
तो आंसुओं में बहते हैं
इसीलिए कहता हूँ
संवेदनाओं में रहता हूँ
न छोडो आशाओं का दामन
लक्ष्य बनाये रखो पावन
करो संघर्ष धीर बनके
जीयो जीवन वीर बनके

         - नागेन्द्र दत्त शर्मा

गुरुवार, 5 जून 2014

क्या ये भी कोई न्याय है...???

थी एक समय की बात
कहीं से उड़कर आया
एक अद्भुत नन्हा सा बीज
और गिरा धरती पर
पड़ा रहा निश्चल
न जाने कितने समय
खाता रहा थपेड़े
धूप-हवा-बरसात के
आये कितने आंधी-तूफ़ान मगर
फिर भी पड़ा रहा अनजाने में
निर्भीक एवं बेसुध
धूल-मिट्टी की परत-दर-परत
चढ़ती गयी उस पर अनगिनत
फिर यकायक
जाग पड़ता है नींद से
अंकुरित होता है
कोंपले फूट जाती हैं
धीरे-धीरे निकलते हैं
नये कोमल हरित पल्लव
अंगड़ाई लेता है
नयी शाखाओं के साथ
रूप बदलता है एक नन्हे पौधे का
नीले आसमान के नीचे
मिलती है एक स्वच्छ सांस
स्नेहिल आभास
पर दूर-दूर तक
नहीं दीखता कोई संगी-साथी
हाँ कुछ पास में थे बडे वृक्ष अवश्य
जो लुटाते थे अपना वात्सल्य
खुश था वो इस खुले आकाश के नीचे
न था किसी तरह के डर का अहसास
छोटे-छोटे जीव उससे प्यार करते थे
लिपटते थे उससे बार-बार
एक दिन उधर से कुलांचे भरते हुए
पैरों तले रौंद कर निकल गया
एक जंगल का अपरिचित जीव और
आहत कर गया नन्हे पौधे को 
पहली बार उसे दर्द का अहसास हुआ
अब किसी भी आहट पर
वह यकायक चौंक पड़ता था
सिमट-सिमट जाता था
भय से थरथराता था परन्तु
प्रकृति की गोद में बढ़ता गया
संकटों को समझता गया
बचपन की चौखट पारकर
जवानी के प्रांगण में पला-बढ़ा
और बढ़ता ही गया कई सालों तक
अनेक जीवों-पशु-पक्षियों से पाला पड़ा
जिनमे कुछ उसके मित्र थे
अब वो बहुतों की छाया था
बहुतों का आसरा था परन्तु-
एक दिन वह काँप गया थर-थर
जब अपने सामने के एक वृक्ष को
कुछ लोगों ने काट गिराया
तब उसके मन को आशंका ने घेरा
न जाने कब नंबर आजाये मेरा
मगर वह तो असहाय था
एक ही जगह स्थिरता का पर्याय था
इंतजार ही उसकी नियति थी
मनुष्य की क्रूरता के आगे
नियति भी खामोश थी
फिर उसके हाथ में क्या था
जंगल के कानून के आधीन था
संकटों को झेलना
दूसरों पर उपकार करना
और अंत में कट कर
अपनी बलि दे देना
क्या ये उसके भाग्य का लेखा है
पूर्व जन्म के धर्म-कर्म का जोखा है
नहीं है पता किसी को
उस ईश्वर की क्या महिमा
दिखता सब जैसे अन्याय है
मन आशंकित हो कहता है-
क्या ये भी कोई न्याय है?
             -नागेन्द्र दत्त शर्मा