मंगलवार, 10 जून 2014

एक दिन सवेरे घर से निकल कर..

एक दिन सवेरे घर से निकल कर 
चला जा रहा था मैं कदम बढाकर 
बेसुध होकर कल्पनाओं में खोकर 
बढ़ा जा रहा था कंटीली डगर पर 
सपनो की कागजी नाव बनाकर 
विचारों के सागर में डूब-उतराकर 
पतवार बिना नाविक को बिठाकर 
शंकाओं के भंवर में खुद को डुबोकर 
नजरें कहीं शून्य में स्थिर जमाकर 
बिना लक्ष्य के जैसे तीर चलाकर 
स्वयं को मोह-माया में फंसा कर 
जिंदगी को पूर्ण निरर्थक बनाकर 
जीवन की उबड़-खाबड़ डगर पर 
कैसे सुनाऊं ये अफ़साना बनाकर 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 










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