कहते हैं लोग इस जहां में
इक 'हाँ' है तो इक 'ना' भी है
इक फूल है तो इक कांटा भी है
जहाँ अमृत है वहां विष भी है
अगर दिन है तो रात भी है
अँधेरा है तो उजाला भी है
उदय है तो अवसान भी है
जहाँ धूप है वहां छाँव भी है
सुबह है तो फिर साँझ भी है
जीवन भी है तो मरण भी है
भलाई है तो बुराई भी है
वक्रता है तो सीधाई भी है
आग है तो पानी भी है
हर एक कहानी में भैया
राजा है तो रानी भी है
चोर है तो सिपाही भी है
प्रत्येक यात्रा वृतान्त में
मंजिल है तो राही भी है
इस जग में सदा विद्यमान
रहेंगे ही शास्वत दो प्रतिमान
हर चेहरे पे जैसे नाक और कान
सोचें तो मानव की बस ये ही शान
देखे होंगे आपने भी अद्भुत रंग
कर देते हैं जो कभी सभी को दंग
महसूसे होंगे कुछ दुःख के पल
खुशियों और कुछ सुख के पल
रंग-बिरंगे हसीन सतरंगे पल
बीत गया जो इक वो भी कल
और आने वाला इक वो भी कल
आज ही नहीं जब शेष हुआ
अभी तक जो आया ही नहीं
वो कैसे फिर विशेष हुआ
मन में वो आशाओं का दीप
जब तक भी प्रदीप्त रहे
तब तक उत्कट अभिलाषा
जीवन की अतृप्त पिपासा
जीने के लिए ही दीप्त रहे
वर्ना बुझ गयी अगर वो प्यास
हो जायेगा सब कुछ समाप्त
जिसका आशय है हमसे
हमारी जीवंतता समाप्त
हमारा उद्द्येश्य समाप्त
हमारा लक्ष्य समाप्त
सारी आकांक्षायें समाप्त
जड़वत पाषाण सदृश
पाषाण जो एक दम स्थिर
न कोई भाव, न भंगिमा
न विचार, न संवेदना के स्वर
जीवन है तो सब कुछ
नहीं तो सब कुछ निरर्थक
सिक्के के दोनों पहलू
जो यहाँ पूर्ण सार्थक
एक अकथनीय कहानी
अपने-अपने अर्थों में पूर्ण सार्थक
अपने-अपने पक्षों पर पूर्ण भारी
बिलकुल रस्सा-कस्सी जैसा दृश्य
कभी कोई इस पार
कभी कोई उस पार
दोनों के अपने-अपने मूल्य
दोनों की अपनी -अपनी पहचान
समवेत स्वरों का गुंजन
प्रतिस्पर्धात्मक नज़ारा
जाज्वल्यमान चेहरे
इक-दूजे की आस्था के स्तम्भ
तर्क-संगत निर्णयक क्षमता
वाह ! तू धन्य है प्रकृति
तेरा खेल ही है न्यारा
संघर्षपूर्ण वातावरण का सृजन
लयबद्ध ताल-छंद और गति
धन्य प्रभु ! तेरी ऐसी समृद्धि
-नागेन्द्र दत्त शर्मा
इक 'हाँ' है तो इक 'ना' भी है
इक फूल है तो इक कांटा भी है
जहाँ अमृत है वहां विष भी है
अगर दिन है तो रात भी है
अँधेरा है तो उजाला भी है
उदय है तो अवसान भी है
जहाँ धूप है वहां छाँव भी है
सुबह है तो फिर साँझ भी है
जीवन भी है तो मरण भी है
भलाई है तो बुराई भी है
वक्रता है तो सीधाई भी है
आग है तो पानी भी है
हर एक कहानी में भैया
राजा है तो रानी भी है
चोर है तो सिपाही भी है
प्रत्येक यात्रा वृतान्त में
मंजिल है तो राही भी है
इस जग में सदा विद्यमान
रहेंगे ही शास्वत दो प्रतिमान
हर चेहरे पे जैसे नाक और कान
सोचें तो मानव की बस ये ही शान
देखे होंगे आपने भी अद्भुत रंग
कर देते हैं जो कभी सभी को दंग
महसूसे होंगे कुछ दुःख के पल
खुशियों और कुछ सुख के पल
रंग-बिरंगे हसीन सतरंगे पल
बीत गया जो इक वो भी कल
और आने वाला इक वो भी कल
आज ही नहीं जब शेष हुआ
अभी तक जो आया ही नहीं
वो कैसे फिर विशेष हुआ
मन में वो आशाओं का दीप
जब तक भी प्रदीप्त रहे
तब तक उत्कट अभिलाषा
जीवन की अतृप्त पिपासा
जीने के लिए ही दीप्त रहे
वर्ना बुझ गयी अगर वो प्यास
हो जायेगा सब कुछ समाप्त
जिसका आशय है हमसे
हमारी जीवंतता समाप्त
हमारा उद्द्येश्य समाप्त
हमारा लक्ष्य समाप्त
सारी आकांक्षायें समाप्त
जड़वत पाषाण सदृश
पाषाण जो एक दम स्थिर
न कोई भाव, न भंगिमा
न विचार, न संवेदना के स्वर
जीवन है तो सब कुछ
नहीं तो सब कुछ निरर्थक
सिक्के के दोनों पहलू
जो यहाँ पूर्ण सार्थक
एक अकथनीय कहानी
अपने-अपने अर्थों में पूर्ण सार्थक
अपने-अपने पक्षों पर पूर्ण भारी
बिलकुल रस्सा-कस्सी जैसा दृश्य
कभी कोई इस पार
कभी कोई उस पार
दोनों के अपने-अपने मूल्य
दोनों की अपनी -अपनी पहचान
समवेत स्वरों का गुंजन
प्रतिस्पर्धात्मक नज़ारा
जाज्वल्यमान चेहरे
इक-दूजे की आस्था के स्तम्भ
तर्क-संगत निर्णयक क्षमता
वाह ! तू धन्य है प्रकृति
तेरा खेल ही है न्यारा
संघर्षपूर्ण वातावरण का सृजन
लयबद्ध ताल-छंद और गति
धन्य प्रभु ! तेरी ऐसी समृद्धि
-नागेन्द्र दत्त शर्मा

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