क्यों खो देते हो तुम वज़ूद अपना
जमीनी हकीकत को भुलाकर
निगाहें तो रहती हैं हरदम फ़लक पे
मगर पैर जमीं पर टिकते नहीं
चाहत तो है चाँद को पाने की मगर
क़ाबलियत छत पर जाने की भी नहीं
क्या ये सच नहीं ? अगर सच है तो-
समझो तो पहले अपने आप को
सोचो आगा-पीछा अपना, सम्भालो होश
देखो किधर है कुवां - किधर खाई ?
फिर भरो दम अपने में इत्मीनान से
कुछ पाने के लिए रखो हौसला
हो ठीक से पता मंज़िल का
हो इरादा भी नेक और पक्का तो
मिल जाती है फतह अपने आप ही
क्योंकि राह दिखाने वाला जानता है
कि कौन कितने पानी में है ?
किसकी नीयत कैसी है, इरादा क्या है ?
किसे कहाँ पहुँचाना है ?
क्योंकि तुम क्या 'नागेन्द्र' सभी तो
उसके हाथों की कठपुतलियां ही हैं
जिनकी सारी डोरियाँ उसके ही हाथों में हैं
कोई नहीं जानता वह कब कौन से
हाथ की, पैर की या गर्दन की डोर या
सारी डोरियाँ एक साथ खीँच ले
जब तक की उसका जी नहीं भरता
तभी तक तुम अपने पर गरूर कर सकते हो
वरना तुम्हारी औकात ही क्या है ?
जोड़ो हक़ीक़त से वास्ता अपना
बंद करो देखना रोज नया सब्ज़बाग
तलाशो अपनी सही मंजिल
क्योंकि जो दिखाई देता है
वह हमेशा सच नहीं होता
"हवाई-महल" बनाकर कभी
जीवन सफल नहीं होता
हमेशा सपनो की दुनिया में रहकर
कोई भी सपना सच नहीं होता
तुम बनाओ अपना लक्ष्य कर्म को
छोडो फल की इच्छा, समझो मर्म को
कर्म करके ही जीत मिलती है
मेहनत से ही ज़िंदगी संवरती है
भाग्य के सहारे पेट नहीं पलता है
दुनिया में मुफ़्त कुछ नहीं मिलता है
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
मौत के डर से ही तो जीवन पलता है
कहीं-न-कहीं छिपा है मर्म जीवन जीने का
सुख के लिए कुछ-न-कुछ दर्द पीने का
फिर भी ऐसे लोग होते हैं
जो कायरों की तरह जीते हैं
जरा भी कष्ट आजाये
तो आंसुओं में बहते हैं
इसीलिए कहता हूँ
संवेदनाओं में रहता हूँ
न छोडो आशाओं का दामन
लक्ष्य बनाये रखो पावन
करो संघर्ष धीर बनके
जीयो जीवन वीर बनके
- नागेन्द्र दत्त शर्मा

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