जीवन के अनमोल पल सजाये यहाँ
एक नयी डगर पर जब पड़े कदम
लेकर वही मुझको चले आये यहाँ
कितने मेले लगे इस जिंदगी में
कितने सबक सीखे-सिखाये यहाँ
हर कोई आया जिंदगी के सपने सजाने
सपना भी सभी का न पूरा हो पाये यहाँ
जितनी यादें संजोकर रखी दिल मे
कैसे कोई उनको मिटा पाये यहाँ
न जाने कैसे किससे कब रिश्ता बना
आज तक भी कोई न समझ पाये यहाँ
तरह-तरह के लोग मिले इस जगह
होली के रंग हो जैसे बिखराये यहाँ
एक अंजानी सी चाहत दिल में लिए
न चाहते हुए सभी रुखसत पाये यहाँ
-नागेन्द्र दत्त शर्मा

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