रविवार, 8 जून 2014

ग़ज़ल- मैंने जितने भी साल बिताये यहाँ .....

जितने भी साल मैंने बिताये यहाँ
जीवन के अनमोल पल सजाये यहाँ 
एक नयी डगर पर जब पड़े कदम 
लेकर वही मुझको चले आये यहाँ 
कितने मेले लगे इस जिंदगी में 
कितने सबक सीखे-सिखाये यहाँ  
हर कोई आया जिंदगी के सपने सजाने 
सपना भी सभी का न पूरा हो पाये यहाँ  
जितनी यादें संजोकर रखी दिल मे 
कैसे कोई उनको मिटा पाये यहाँ 
न जाने कैसे किससे कब रिश्ता बना 
आज तक भी कोई न समझ पाये यहाँ 
तरह-तरह के लोग मिले इस जगह 
होली के रंग हो जैसे बिखराये यहाँ 
एक अंजानी सी चाहत दिल में लिए 
न चाहते हुए सभी रुखसत पाये यहाँ 
                     -नागेन्द्र दत्त शर्मा 

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