खग बोलें तो
जीवन डोले अनोखी
प्रातः बेला में।
सतरंगे फूलों-संग
हो मन दंग।
कलियाँ चटकायें
मस्त फ़िज़ा में ।
कभी उजाला, दोनों
पक्ष सिक्के के।
एक दीपक में प्रकाश
अपना फैलाती।
संध्या निर्मल, पर क्यों
निशा श्यामल ?
उजाले को, बिछड़ने का
फिर मलाल क्यों ?
निशा भी आयेगी लेके
सौगात में उषा को ।
जुगनू भेदे अपनी
टॉर्च चमका के ।
मेघा भड़के, रोये
बरखा रानी ?
बनके बहार लाई
सुकून सावन में।
बिजली कड़के, सावन
फिर क्यों तरसें ।
मेघां गरजें, नीर बरसें
धरा प्यास बुझाये।
सावन ने सजाई
हरियाली कैसे?
जीवन डोले अनोखी
प्रातः बेला में।
सतरंगे फूलों-संग
हो मन दंग।
कलियाँ चटकायें
मस्त फ़िज़ा में ।
कभी उजाला, दोनों
पक्ष सिक्के के।
एक दीपक में प्रकाश
अपना फैलाती।
संध्या निर्मल, पर क्यों
निशा श्यामल ?
उजाले को, बिछड़ने का
फिर मलाल क्यों ?
निशा भी आयेगी लेके
सौगात में उषा को ।
जुगनू भेदे अपनी
टॉर्च चमका के ।
मेघा भड़के, रोये
बरखा रानी ?
बनके बहार लाई
सुकून सावन में।
बिजली कड़के, सावन
फिर क्यों तरसें ।
मेघां गरजें, नीर बरसें
धरा प्यास बुझाये।
सावन ने सजाई
हरियाली कैसे?

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