सोमवार, 28 अप्रैल 2014

'प्रकृति' पर 'हाइकू'


खग बोलें तो
जीवन डोले अनोखी
प्रातः बेला  में।
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बासंती-रंग
सतरंगे फूलों-संग
हो मन दंग।
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भ्रमर गायें
कलियाँ चटकायें
मस्त फ़िज़ा में ।
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कभी अँधेरा
कभी उजाला, दोनों
पक्ष सिक्के के।
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मिलके तेल-बाती
एक दीपक में प्रकाश
अपना फैलाती।
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उषा धवल 
संध्या निर्मल, पर क्यों 
निशा श्यामल ?
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निशा ने जन्मा 
उजाले को, बिछड़ने का
फिर मलाल क्यों ?
  •  
संध्या आई तो
निशा भी आयेगी लेके
सौगात में उषा को ।
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सावन का अँधेरा
जुगनू भेदे अपनी
टॉर्च चमका के ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघा भड़के, रोये 
बरखा रानी ?
  •  
रिमझिम फुहार
बनके बहार लाई
सुकून सावन में।
  •  
मेघां गरजें
बिजली कड़के, सावन
फिर क्यों तरसें ।
  •  
दामिनी तड़के
मेघां  गरजें, नीर बरसें
धरा प्यास बुझाये।
  •  
रिमझिम फुहार से
सावन ने सजाई
हरियाली कैसे?



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